हाइकु कोश *वर्ण*
हाइकु कोश वर्ण क्रमानुसार
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हाइकु कोश
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Thursday, 11 April 2013
कुआँ गाँव का
कुआँ गाँव का
करता मुखबिरी
रिश्तों के बीच
-योगेन्द्र वर्मा
[फेसबुक हाइकु समूह से साभार]
Thursday, 20 December 2012
कँपकँपाते
कँपकँपाते
जमते सर्द दिन
अलाव ढूँढ़ें
-डा० सरस्वती माथुर
[फेसबुक से साभार]
Monday, 24 September 2012
काले मेघों में
काले मेघों में
खींच रहे बगुले
उज्ज्वल रेखा
-रामकृष्ण विकलेश
(हाइकु पत्र- 22, अंक - अगस्त 1984 से साभार)
Sunday, 26 August 2012
किरण–छड़ी
किरण–छड़ी
उठाकर निकला
जेठ–सूरज ।
-शम्भूदयाल सिंह ‘सुधाकर’
[हाइकु-१९८९ से साभार]
कहो पहाड़
कहो पहाड़
तुम्हारी देह है या
हाड़ ही हाड़।
-राम सुमेर ‘मधुपर्क’
[हाइकु-१९८९ से साभार]
कैसे चलतीं
कैसे चलतीं
चींटियाँ कतार में
कौन सिखाता ?
-डा० मोती लाल जोतवाणी
[हाइकु-१९८९ से साभार]
कौन–सा राग
कौन–सा राग
टीन की छत पर
बजाती वर्षा।
-डा० भगवतशरण अग्रवाल
[हाइकु-१९८९ से साभार]
Saturday, 25 August 2012
कोहरा ओढ़े
कोहरा ओढ़े
छिप के आई रात
चाँद तकने
-स्वाति भालोटिया
Wednesday, 13 June 2012
कैसे सो पाऊँ
कैसे सो पाऊँ
बेला जब गाता हो
गंध का गीत
-डा० भगवतशरण अग्रवाल
[ "इन्द्रधनुष" हाइकु संग्रह से साभार ]
Sunday, 3 June 2012
की बगावत
की बगावत
नींव के पत्थरों ने
ढहे महल ।
-लक्ष्मीशंकर वाजपेयी
Saturday, 24 March 2012
कोंपल जन्मी
कोंपल जन्मी
डरी-डरी सहमी
हिरोशिमा में
-कमल किशोर गोयनका
Saturday, 14 January 2012
किरण मिली
किरण मिली
सतरंगी हो गयी
आँसू की बूँद।
-सुरेश वात्स्यायन
(हाइकु पत्र 21, दिसम्बर-1983 से साभार)
Thursday, 6 October 2011
कूकी कोयल
कूकी कोयल
डोला मन भँवरों का
बौराये आम ।
-शैल सक्सेना
( हाइकु पत्र-20, मार्च-1983 )
Sunday, 18 September 2011
कब समझे
कब समझे
नभचुम्बी कंगूरे
नींव की टीस ।
-डा० रामनिवास मानव
(
शेष बहुत कुछ
,
हाइकु संग्रह से
)
Sunday, 28 August 2011
कारी डोंगरी
कारी डोंगरी
उकडूँ बैठी रही
विहान तक ।
-डा० राजेन जयपुरिया
( हाइकु दर्पण मार्च
2004
से साभार )
Sunday, 7 August 2011
कतार बद्ध
कतार
बद्ध
सर्दी से ठिठुरते
चीड़ के पेड़ ।
-प्रत्यक्षा सिन्हा
Sunday, 31 July 2011
कोयल घोले
कोयल घोले
कुहुक कुहुक के
टोना वन में !
-पूर्णिमा वर्मन
(हाइकु दर्पण से)
Tuesday, 12 July 2011
कड़ी धूप में
कड़ी धूप में
मशाल लिये खड़ा
तन्हा पलाश ।
-कमलेश भट्ट कमल
( इन्द्रधनुष हाइकु संकलन से )
कोमा में गया
कोमा में गया
फिर जागा ही नहीं
मेरा ज़मीर
-आर पी शुक्ल
काट ही बैठे
काट ही बैठे
हाथ–पैर अपने
पेड़ काट के ।
- अशोक कुंगवानी
( साभार हाइकु 1989 )
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