हाइकु कोश *वर्ण*
हाइकु कोश वर्ण क्रमानुसार
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हाइकु कोश
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Sunday, 20 June 2021
सागर संग
सागर संग
ठुमकती चाँदनी
रुआँसा चाँद
-आलोक मिश्रा
Wednesday, 6 May 2020
सिसकती है
सिसकती है
सफेद पत्थरों में
खामोश रात
-त्रिलोचना कौर
Friday, 8 February 2019
सूर्य के घर
सूर्य के घर
दीवार फाँद आया
रात को चाँद
-अमन चाँदपुरी
Saturday, 6 June 2015
सिन्दूरी साँझ
सिन्दूरी साँझ
बतियाते रहते
टेसू के गाँछ
-योगेन्द्र वर्मा
[फेसबुक हाइकु समूह से]
Sunday, 1 March 2015
सुर्ख पलाश
सुर्ख पलाश
कामनाएँ मचलीं
आया जो फाग
-मंजु शर्मा
[फेसबुक हाइकु समूह से]
Sunday, 31 August 2014
साँझ बुढ़िया
साँझ बुढ़िया
नभ के चरखे पे
रात कातती
-डा॰ सरस्वती माथुर
(अनुभूति से साभार)
Sunday, 22 June 2014
सौ सौ कानों से
सौ सौ कानों से
कनेर ने सुनी हैं
हवा की बातें
-कमलेश भट्ट कमल
Sunday, 26 January 2014
सन्देश मेरा
सन्देश मेरा
पहुँचा तो होगा ही
वर्षा-बूँदों में
-डा॰ सावित्री डागा
[हाइकु 1989 से]
Tuesday, 7 January 2014
संकरी गली
संकरी गली
बताते सारा हाल
गाँव के लोग
-नीलम डडवाल
[हाइकु हिन्दुस्तानी समूह से]
Friday, 19 July 2013
सन्त दीखता
सन्त दीखता
ठूँठ सा बड़ा वृक्ष
जर्जर हुआ
-शशि पुरवार
[फेसबुक हाइकु समूह से]
Tuesday, 23 April 2013
सुबह खिली
सुबह खिली
मालिन गूँथ रही
नये सपने
-अश्विनी कुमार विष्णु
Thursday, 20 December 2012
सहला गयी
सहला गयी
घुँघराली लटों को
बेशर्म हवा
-सुनीता अग्रवाल
[फेसबुक से साभार]
Sunday, 26 August 2012
साँझ होते ही
साँझ होते ही
अँधियारा बौराया
घूमता फिरा।
-डा० शैल रस्तोगी
[हाइकु-१९८९ से साभार]
Saturday, 25 August 2012
सूखे ठूँठ में
सूखे ठूँठ में
वर्षा ने उगा दी है
हरी कोंपल
-राम कृष्ण विकलेश
[हाइकु-१९८९ से साभार]
Wednesday, 13 June 2012
सुबह हुई
सुबह हुई
बतियाने लगे हैं
रसोईघर
-डा० शैल रस्तोगी
[ "सन्नाटा खिंचे दिन" हाइकु संग्रह से साभार ]
Sunday, 3 June 2012
साँझ की बेला
साँझ की बेला
पंछी ॠचा सुनाते
मैं हूँ अकेला ।
-रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
Friday, 6 April 2012
सोकर उठा
सोकर उठा
पूरब की गोद से
दिन आज भी ।
-वीरेन्द्र आज़म
साँस का घर
साँस का घर
घूमा संसार भर
रहा अकेला ।
-रजनी कांत
Saturday, 14 January 2012
सूर्य सो गया
सूर्य सो गया
तारे गद्दी जा बैठे
जागा तो भागे।
-राधेश्याम
(हाइकु पत्र 21, दिसम्बर-1983 से साभार)
Monday, 21 November 2011
सहमी डरी
सहमी डरी
झरतीं चुपचाप
पीली पत्तियाँ।
-डा० सुरेन्द्र वर्मा
( '
धूप कुंदन
'
हाइकु संग्रह से साभार
)
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